देशभर में मौसम के बदलते मिजाज और कमजोर मानसून के प्रभाव अब साफ तौर पर दिखाई देने लगे हैं, जिसके चलते देश के प्रमुख जलाशयों और बांधों में पानी का स्तर पिछले कई वर्षों के मुकाबले काफी नीचे पहुंच गया है। मौसम विज्ञान से जुड़े जानकारों और जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल प्रशांत महासागर में सक्रिय हुए अल नीनो (El Nino) और मानसूनी हवाओं के असमान पैटर्न ने भारत के कई राज्यों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस स्थिति के कारण देश के बड़े हिस्से में जल संरक्षण और कृषि सिंचाई को लेकर चिंताएं एक बार फिर गहराने लगी हैं, क्योंकि बांधों में पानी की आवक कम होने से आने वाले दिनों में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बँटवारे को लेकर चल रहा पुराना विवाद भी इसी जल संकट की वजह से एक बार फिर तूल पकड़ चुका है। स्थिति यह है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और विनियमन समितियों के सामने दोनों राज्यों की अपनी-अपनी गंभीर दलीलें हैं। कर्नाटक का तर्क है कि उसके अपने जलाशयों और बाधों में पर्याप्त जल भंडारण नहीं है, जिससे बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों की पेयजल जरूरतों और स्थानीय किसानों की सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा करना मुश्किल हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, तमिलनाडु का कहना है कि उसके डेल्टा क्षेत्रों में फसलों को बचाने और किसानों की आजीविका सुरक्षित रखने के लिए तयशुदा मात्रा में पानी का मिलना बेहद जरूरी है। जलाशयों में पानी की आवक में भारी कमी दर्ज होने के बाद से दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच का यह राजनीतिक और प्रशासनिक तनाव काफी बढ़ गया है।
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव से केवल दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि देश के अन्य क्षेत्र भी प्रभावित हो रहे हैं। मानसूनी बारिश के असमान वितरण के कारण कई राज्यों में भूजल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में कृषि कार्य और पशुपालन बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में सर्दियों की बारिश या उत्तर-पूर्वी मानसून से अपेक्षित राहत नहीं मिली, तो शहरी क्षेत्रों में भी पेयजल आपूर्ति को लेकर आपातकालीन कदम उठाने पड़ सकते हैं। बढ़ती गर्मी और पानी की कमी का यह दौर न केवल आम आदमी के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए अब सरकारों और प्रशासनिक निकायों को जल प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों और दीर्घकालिक रणनीतियों पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है।
